जिमीकंद की खेती कैसे करें?

जिमीकंद (ओल) की खेती कैसे करें (Jimikand Farming) और लाभ कमाएं? किसान भाइयों क्या आप ओल की खेती करने की सोच रहे हैं? जानिए इससे जुडी जानकारी जैसे इसके बिज, जमीन की तैयारी, इसमें लगने वाले रोग और लाभ प्रति एकड़ की गणना।

भारत वर्ष में किसानो के द्वारा कई प्रकार के सब्जियाँ उगाई जाती है जिसमे जिमीकंद (ओल) भी सम्मिलित है। यह एक प्रकार का सब्जी है जिसे कई नामो से जाना जाता है। जिमीकंद (ओल) के अलावा इसे जिमीकंद या घनकंद भी कहा जाता है जो अंग्रेजी के Elephant Foot Yam या Whitespot Giant Arum जैसे शब्दों से पुकारा जाता है।

Jimikand Ki Kheti Kaise Kare
Jimikand Ki Kheti Kaise Kare

यह एक उष्णकटिबंधीय कंद फसल है, जो मुख्य रूप से अफ्रीका, दक्षिण एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया के साथ साथ अन्य उष्णकटिबंधीय क्षेत्रो में इसकी खेती की जाती हैं।जिमीकंद (ओल) के सभी भाग का इस्तेमाल मनुष्य के द्वारा विभिन्न तरीको से किया जाता है। कही लोगो के द्वारा इसके जड़ का इस्तेमाल करी, भरता, चोखा, चटनी एवं आचार के रूप में करते है।

भारत के कई हिस्से में इसके पत्ते का इस्तेमाल साग के रूप में करते है। व्यंजन के अलावा इस फसल का इस्तेमाल अन्य कई रूप में भी किया जाता है। आयुर्वेद विज्ञान इसका इस्तेमाल मनुष्य के शरीर में होने वाले कुछ समस्या का समाधान के लिए करते है।

जिमीकंद की वैज्ञानिक खेती – Jimikand Farming

जिमीकंद की खेती एक औषधीय फसल के रूप में की जाती है। जिसे ओल और सूरन के नाम से भी जाना जाता है। जिसका उपयोग सब्जी के रूप में भी किया जाता है। इसके पौधों पर उगे फल जमीन के अंदर कंद के रूप में उगते हैं।

जिनका उपयोग कई तरह की बीमारियों में किया जाता है। इसके फल का प्रभाव गर्म होता है। इस भोजन के कारण गले में खुजली होती है। लेकिन वर्तमान में इसके प्रतिरोधी की कई नई किस्में बनाई गई हैं, जिन्हें खाने से खुजली नहीं होती है।


  • जिमीकंद का अर्थ: एरेसी

  • जिमीकंद वैज्ञानिक नाम: Elephant Foot Yam (Amorphophallus Paeoniifolius)
  • जिमिकंद अन्य नाम: सूरन, बालुकन्द, अरसधाना, कंद तथा ओल, चीनी आदि

ओल यानी जिमीकंद “एरेसी” परिवार का सबसे प्रसिद्ध पौधा है जिसे भारत में कई नामों से जाना जाता है जैसे कि सूरन, बालुकंद, अरशदाना, कंद और चीनी आदि। इसकी खेती भारत में प्राचीन काल से होती रही है और इसके गुणों के कारण यह सब्जियों में एक अलग स्थान रखता है।

बिहार में इसकी खेती गृह-वाटिका से लेकर बड़े पैमाने पर हो रही है और यहां के किसान इसकी खेती आज नगदी फसल के रूप में कर रहे हैं। ओल में पोषक तत्वों के साथ-साथ कई औषधीय गुण होते हैं, जिसके कारण इसका उपयोग आयुर्वेदिक दवाओं में किया जाता है।

इसे बसीर, खुनी बसीर, पेचिश, ट्यूमर, दमा, फेफड़े की सूजन, उदर पीड़ा, रक्त विकार में उपयोगी बताया गया है। हल्की छायादार जगहों पर भी इसकी अच्छी तरह से खेती की जा सकती है, जो किसानों के लिए बहुत फायदेमंद साबित हुई है।

जिमीकंद (ओल) की उन्नत किस्में


Climate एवं जलवायु के अनुसार जिमीकंद (ओल) के विभिन्न किस्मे पाए जाते है जिनमे से मुख्य तीन किस्म की उपज भारत में किया जाता है। इसके विभिन्न किस्म का इस्तेमाल इसके अधिक उत्पादन के लिए भी किया जाता है, तो आइए जानते है इसके सभी किस्मो के बारे में :-

1. संतरा गांची

इस किस्म की फसल अन्य फसलों की तुलना में जल्दी पक जाती है। इस किस्म में उत्पादित फसल में थोड़ा कड़वा स्वाद होता है, इस प्रकार के कंद की सतह थोड़ी खुरदरी होती है, जो तितली के रंग की होती है।

यदि आप अपने खेतों में इस किस्म का उत्पादन करते हैं, तो यह एक हेक्टेयर भूमि में 50 से 65 क्विंटल देती है। इस किस्म में, महिला पकौड़ी प्राप्त की जाती है, जिसे आप बीज के रूप में पुन: उपयोग कर सकते हैं।

2. कोववयूर

कोववयूर जिमीकंद (ओल) संतरा गाची के समान है लेकिन इस किस्म में उच्च उपज क्षमता होती है और मादा घनकंद नारंगी गैंची की तरह नहीं पाई जाती है। यदि आप अपने खेतों में इस किस्म का उपयोग करते हैं, तो आपको प्रति क्विंटल 100 क्विंटल या उससे अधिक मिलता है।

3. गजेन्द्र

यह किस्म कृषि विज्ञान केंद्र संबलपुर द्वारा निर्मित की गई है। इस तरह के फल खाने से गले में खुजली नहीं होती है। यह किस्म बरसात के पहले और बाद दोनों में उगाई जा सकती है। इस किस्म का प्रति हेक्टेयर उत्पादन लगभग 80 टन पाया जाता है।

इसके फल के चारों ओर बने छोटे कंद (कन्या कंद) इस किस्म में नहीं बनाए जाते हैं, क्योंकि इसके एक पौधे से केवल एक फल प्राप्त होता है। इसके कंद में पाए जाने वाले मलाशय का रंग हल्का नारंगी होता है।

4. गजेन्द्र -1

जिमीकंद की यह किस्म अन्य किस्मों से बहुत अलग है। इस किस्म में कैल्शियम की मात्रा दूसरों की तुलना में कम होती है, जिसके कारण इसे खाने के बाद गले में जलन महसूस होती है और यह खाने में भी स्वादिष्ट होता है। इसका कंद का गूदा 150-200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज के साथ गुलाबी रंग का होता है।

5. एम -15

इस किस्म को श्री पद्म के नाम से भी जाना जाता है। इसके पौधे पर केवल एक फल उत्पन्न होता है। इस किस्म के पौधों की प्रति हेक्टेयर पैदावार 70 से 80 टन तक पाई जाती है। इसके फलों में खुजली या तीखापन बहुत कम पाया जाता है। दक्षिण भारत के लोग इस तरह के जिमीकंद को उगाना पसंद करते हैं।

जिमिकंद के लिए खेत की तैयारी


जिमीकंद (ओल) की फसल के लिए जल्वायो के बाद उचित भूमि का होना आवश्यक है। इसके फसल के लिए अच्छी तरह सुखी उपजाऊ लाल-चिकनाई मिट्टी की आवश्यकता होती है एवं मिट्टी का PH मान 5.5 से 7.2 में मध्य अति उत्तम होता है।

जिमिकंद के लिए जलवायु

किसी फसल के उत्तम विकास के लिए उचित जलवायु का होना अति आवश्यक होता है। जिमीकंद (ओल) एक ऐसा फसल है जो उपोष्णकटिबंधीय और उष्णकटिबंधीय फसल है, इस वनस्पतिक विकास के लिए ठंडी एवं शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है वही इसके Corm Development के लिए नरम एवं गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है। एवं आवश्यक वार्षिक वर्ष इसके विकास के लिए उचित होता है।

मिट्टी की तैयारी

किसी भी फसल को लगने से पहले खेत जो तैयार करना अति आवश्यक होता है। अगर आप जिमीकंद (ओल) का खेती करना चाहते है तो इसको लगाने से पहले 60X60X45 Cm के माप में 90 Cm की दुरी पर गड्डा खोद ले। अब इस गड्डे में खाद डाल कर मिला दे एवं गड्डे से निकले मिट्टी में भी खाद को मिलाए और इसे 2 या 3 दिन के लिए छोड़ दे।

बीजों की रोपाई का तरीका


फसल को लगते समय बीज के बीच Required Space नहीं देने पर फसल का Growth सही नहीं हो पाता है। अगर आप जिमीकंद (ओल) की खेती कर रहे है तो इसके बीज को लगते समय यह ध्यान रखे की फसल के आपस की दुरी 90 Cm से कम ना हो।

जिमीकंद (ओल) का फसल बुआई

खेत में की गई गड्डे में जिमीकंद (ओल) को डाले। अगर इसका आकर बढ़ा है तो आप इसे 500 ग्राम के टुकडे में काट कर कटे हुए भाग पर गोबर का एक परत चढ़ा दे इससे जिमीकंद (ओल) में किसी प्रकार का कीड़ा नहीं लगेगा एवं फसल सुरक्षित रहेगा।

खाद और उर्वरक

स्वस्थ उपज के लिए उचित Fertilizer की आवश्यकता होती है। खेत की अंतिम जुताई से पहले खेतो में 30 टन प्रति हेक्टेयर के दर से जैविक खाद को डाल कर जुताई करे। फसल को रोपने के उपरांत नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटैशियम 80:60:100 Kg प्रति हेक्टेयर के दर से दो बार खेतो में डाले।

पौधों की सिंचाई

वैसे तो इस फसल के लिए अधिक सिचाई की आवश्यकता नहीं होती परन्तु शुष्क मौसम होने पर फसल में सिचाई की आवश्यकता होती है। जलवायु और मिट्टी की नमी धारण क्षमता के आधार पर फसल में एक सप्ताह में एक बार सिंचाई करनी चाहिए। और अगर खेतो में पानी जमा हो रहा है तो खेत से पानी को निकलने का उपाय करे।

खरपतवार नियंत्रण


फसल लगाने के बाद फसल के साथ साथ कई प्रकार के खर पतवार भी निकलते है जो फसल के विकास को प्रभावित करते है इसलिए समय समय पर फसल से अनावश्यक खर पतवार का निकाय करे।

कीट और रोग नियंत्रण

जिमीकंद (ओल) के फसल में मुख्य रूप से Leaf Spot एवं Collar Rot जैसे समस्या पाई जाती है। इसके लिए आप निम्न उपायों को आजमाए :-

  • Leaf Spot: इस समस्या में Mancozeb को 2 G/Ltr में मिलकर फसल का छिडकाव करे।
  • Collar Rot: यह बीमारी मिट्टी से उत्पन्न कवक के कारण होता है। इस समस्या का समाधान के लिए 50 किग्रा जैविक खाद के साथ Trichoderma HarzianumI के 2.5 Kg मिलकर एक हेक्टेयर खेत में डाले। किसी भी अन्य संक्रमण के होने पर पौधे को खेत से हटा दे एवं खेतो में जल जमाव नहीं होने दे।

कंदों की खुदाई

जिमीकंद (ओल) का फसल बुआई के 7 से 9 महीने में पुरे तरह से तैयार हो जाता है। फसल तैयार होने पर इसके टुकड़ों को बखुद सूखने लगते है जिसके उपरांत खेत में हलकी सिचाई कर आप इसकी फसल की बहाव कर सकते है। पासक खुई के उपरांत इसे अच्छे से साफ कर मंडी में भेज दिया जाता है।

पैदावार और लाभ

जिमीकंद की विभिन्न किस्मों की औसत उपज 70 से 80 टन तक होती है। जिसका बाजार भाव लगभग 2000 प्रति क्विंटल पाया जाता है। जिसके कारण किसान भाई एक बार में एक हेक्टेयर से 4 लाख से अधिक आसानी से कमा सकता है।

Founder @Sahu4You
Vikas Sahu

About Vikas Sahu

Vikas Sahu is the CEO and Founder of Sahu4You, Vikas Sahu is a ProBlogger & Entrepreneur. Vikas runs a popular Hindi tech blog Sahu4You

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