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लोहड़ी माता की कथा – Lohri Mata Ki Katha

लोहड़ी माता की कथा

लोहड़ी माता जिन्हें ‘ललिता‘ भी कहा जाता है, एक लोकप्रिय हिंदू देवी हैं। लोहड़ी माता के बारे में कई कथाएँ प्रचलित हैं।

एक लोककथा के अनुसार, लोहड़ी माता प्राचीन काल में राजा भोज की पुत्री थीं। एक बार जब राजा भोज युद्ध के लिए निकले तो लोहड़ी ने पिता की विजय के लिए अग्नि देव से प्रार्थना की।

प्रसन्न होकर अग्नि देव ने लोहड़ी को एक अलौकिक शक्ति प्रदान की जिससे वह अपने पिता की सेना के लिए आहुति दे सकती थी। लोहड़ी ने अपने पिता की विजय में अहम भूमिका निभाई।

एक अन्य कथा के अनुसार, लोहड़ी माता प्राचीन काल में एक किसान परिवार में जन्मी थीं। वे बचपन से ही कड़ी तपस्या करती थीं। एक बार सर्दियों में उनके भाई जंगल में भटक गए। लोहड़ी ने अपने भाई को ढूँढने के लिए एक मशाल जलाई और उन्हें सुरक्षित घर लाया।

इसी घटना से लोहड़ी माता को मशाल जलाने वाली देवी के रूप में जाना जाने लगा। आज भी लोग लोहड़ी के दिन मशाल जलाकर लोहड़ी माता की पूजा करते हैं और उनकी कृपा की कामना करते हैं।

लोहड़ी पर्व की जरूरी कथाएं

एक पौराणिक कथा के अनुसार, लोहड़ी की आग दक्ष प्रजापति की पुत्री माता सती की याद में जलाई जाती है. दक्ष प्रजापति की पुत्री माता सती कोई और नहीं बल्कि भगवान शिव की अर्धांगिनी मां पार्वती थीं. एक बार जब राजा दक्ष ने एक महायज्ञ का आयोजन किया था, जिसमें सभी देवताओं को आमंत्रित किया गया. लेकिन, राजा दक्ष ने भगवान शिव और माता सती को आमंत्रित नहीं किया.

जब मां सती बिना आमंत्रण के वहां पहुंची तो राजा दक्ष ने शिवजी का बहुत अपमान किया. जिस कारण सती ने अग्नि में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए. तभी से सती के अग्नि में समर्पित होने के कारण लोहड़ी का पर्व मनाया जाने लगा और ये एक लोहड़ी पर्व की परंपरा बन गई, जो सदियों से चली आ रही है.

बता दें कि जब शिवजी के अपमान को माता सती नही सहन कर पाई तो यज्ञ की हवन में ही अपनी आहुति दे दी तब से माता सती की याद में हर वर्ष लोहड़ी का पर्व मनाया जाता है. लोहड़ी का पर्व हर साल मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाया जाता है.

एक और मान्यता के अनुसार, लोहड़ी को दुल्ला भट्टी से जोड़ा जाता है. लोहड़ी के दिन जितने भी गीत गाए जाते हैं. सभी गीतों में दुल्ला भट्टी का उल्लेख जरूर मिलेगा. दुल्ला भट्टी मुगल शाषक अकबर के समय का विद्रोही था जो कि पंजाब में रहता था. दुल्ला भट्टी के पुरखे भट्टी राजपूत कहलाते थे. उस समय लड़कियों को गुलामी के लिए अमीर लोगों के बीच बेचा जाता था. दुल्ला भट्टी ने न केवल उन लड़कियों को बचाया बल्कि उनकी शादी भी कराई. दुल्ला भट्टी ने एक योजना के तहत इस काम में रोक भी लगाई और दुल्ला भट्टी गरीब लड़कियों की शादी अमीर लोगों को लूटकर कराता था.

एक और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार, लोहड़ी के दिन कंस ने श्रीकृष्ण भगवान को मारने के लिए लोहिता नाम की राक्षसी को गोकुल भेजा था, जिसे श्रीकृष्ण जी ने खेल खेल में ही मार दिया था. इसीलिए भी लोहड़ी का पर्व मनाया जाता है.