गयासुद्दीन बलबन की जीवनी – Balban History in Hindi

जानिए दिल्ली के सुल्तान गयासुद्दीन बलबन से जुडी जीवनी और इतिहास के बारे में। इनका पूरा नाम गयासुद्दीन बलबन था, जानिए इनकी इतिहास, परिवार, उपलब्धिया और मृत्यु से जुडी जानकारी। ये इलबारी तुर्क जाति के थे।

उनके पिता उच्च श्रेणी के सरदार थे। इन्होने एक नए राजवंश लब बलबनी वंश ’का गठन किया था। बलबन ग़ुलाम वंश के नौवे सुल्तान थे। ये मौलिक रूप से सुल्तान इल्तुतमिश के तुर्की ग़ुलाम थे। बचपन में हीं मंगोलों ने उन्हें बगदाद के बाजार में बेच दिया था।

Ghiyasuddin Balban Jivni History in Hindi
Ghiyasuddin Balban Jivni History in Hindi

ख़्वाजा “जमालुद्दीन बसारी” नामक एक शख्स ने इन्हें ख़रीद कर अपने साथ दिल्ली ले आया।

सुल्तान गयासुद्दीन बलबन जीवनी

नाम बहाउद्दीन
ज्ञात रूप घियासुद्दीन बलबन
जन्म तिथि 1200
जन्म स्थान तुर्कस्तान, कजाकिस्तान
पिता का नाम ज्ञात नहीं
पत्नी ज्ञात नहीं
बच्चे नसीरुद्दीन, बुघरा खान
मृत्यु 1286
छवि ज्ञात नहीं

दिल्ली आने के बाद सुलतान इलतुमीश ने बलबन को खरीद लिया। अपने स्वामी के प्रति ईमानदारी व सेवाभाव के बदले में उन्हें चेहलगन के दल में जोड़ लिया गया।

रज़िया सुलतान के राज्यकाल में बलबन को “अमीर-ए-शिकार” का पद मिला। मुइज़ुद्दीन बहराम के जब उन्हें “इमाम-ए-अफ़ूर” का पद मिला।

उसके बाद सन 1245 में मंगोलों से लोहा लेकर बलबन ने अपने तनाव से संबंधित गुण का प्रमाण भी दिया था। बारहिरुद्दीन के निधन होने के बाद सन 1266 में बलबन “ग़यासुद्दीन बलबन” नाम से दिल्ली के राजसिंहासन पर बैठे।

बलबन की बेटी का विवाह सुल्तान मुईजुद्दीन बहरामशाह से हुआ था जिसने उसे अपना मंत्री और सहायक नियुक्त किया था।

बलबन की नीति व सिद्धांत

उत्तर पश्चिम के सीमा पर मंगोल के हमले के डर को ख़त्म करने के लिए बलबन ने एक प्रियचरत योजना सोची। उन्होंने सीमा पर कीलों का तार बनवाया और हर किल में एक बड़ी संख्या में सेना रखवाई।

कुछ साल के बाद उत्तर-पश्चिमी सीमा को दो भाग में बांट दिया गया था। एक क्षेत्र “शहज़ादा मुहम्मद” को दिया गया और दूसरा क्षेत्र “बुगरा ख़ाँ” को।

हर शहज़ादे के लिए आमतौर पर लगभग 18 हज़ार अरबों की एक विशाल सेना दी गई थी।

ग्यासुद्दीन क्रूरता का सिलसिला

बलबन ने सैन्य विभाग “दीवान-ए-अर्ज” को पुनर्गठन कर और इमादुलमूल को इस पद पर प्रतिष्ठित किया। बलबन ने तुर्क के प्रभाव को कम करने के लिए फ़ारसी परंपरा पर आधारित “सिजदा” (घुटने टेग कर अपने राजा के सामने झुकाना) और “पाबोस” (पैर चूमना) के रिवाज़ को अनिवार्य कर दिया।

यही नहीं इन्होने फ़ारसी रीति-रिवाज पर आधारित नवरोज उत्सव को भी शुरू कर दिया। अपने दुश्मनों के लिए बलबन ने कड़ा लिए लौह व रक्त ‘नीति का पालन किया।

इस नीति के में दुश्मनों की हत्या कर के उसकी पत्नी और बच्चों को गुलाम बना लिया गया था जो की एक शर्मसार निति थी जिसके कारण ज्यादातर मुस्लिम राजा को पसंद नहीं किया जाता है। और यही कारण है की बलबन की कोई भी उपलब्धिया नहीं गिनी जाती है।

बलबन के खिलाफ षड़यंत्र रचना

बलबन की सफलता को देख कर तुर्क के सरदारों का दल उससे नफरत करने लगा और उसे उसके पद से हटाने के लिए शड़यंत्र रचने लगा था।

सन 1250 में तुर्क के सरक्षकों ने बलबन को बड़े ही छलकी से उसके पद से हटा दिया। उसके पद पर एक भारतीय मुसलमान जिसका नाम पर इमादुद्दीन रिहान ’था उसे बैठाया गया।

बलबन ने अपना पद छोड़ दिया, लेकिन उसके बावजूद उन्होंने चुपके से अपने समर्थकों को अपनी ओर से रोका।

शक्ति की परीक्षा

अपने पद से खज़िज कर दिए जाने के दो साल बाद ही बलबन ने अपने कुछ दुश्मनों पर काबू पा लिया। अपने दुश्मनों पर काबू पाएं हीं बलबन अपनी शक्ति परीक्षा के लिए तैयार हो गया था।

इनकी शक्ति के आगे सुल्तान महमूद को भी झुकना पड़ा था। उसके बाद सुल्तान महमूद की 1265 में मृत्यु हो गई। कुछ लोगो का कहना था की बलबन ने हीं सुल्तान महमूद को ज़हर देकर मारा था और सिंहासन पाने के लिए उनके दोनों बेटों की भी जान ले ली थी।

बलबन अपनी शक्ति में किसी को भी शामिल नहीं करता था। उसे घमंड इतना था की वो अपने किसी समर्थक की भी आलोचना बर्दास्त नहीं करती थी। बलबन का एक मुख्य काम “चहलगानी” की शक्ति को ख़त्म कर के सम्राट की शक्ति को बुलंद करना था।

अपने इस कार्य को पूरा करने के लिए उन्होंने अपने सम्बन्धी “शेर ख़ाँ” तक को ज़हर देकर मार डाला था, जो की एक कायरता पूर्ण निर्णय थी।

राजपूतों की आजादी – मेवातियों का सफाया

दोआब व अवध में सड़कों की हालत ख़राब होने की वजह से और इस क्षेत्र के चारों ओर डाकुओं के डर की वजह से ये जगह खट्टी थीं और इसी कारण से पूर्वी क्षेत्र से संपर्क रखना मुश्किल हो गया था।

कुछ राजपूत जमींदारो ने इस क्षेत्र में क़िले बना कर अपनी स्वतंत्रता को घोषित कर दिया था। मेवातियों में दिल्ली के इर्द गिर्द के क्षेत्र में लूटपाट होने लगा था। बलबन ने इन सभी चीजो पर बड़ी मुश्किल से नियंत्रण किया।

लूटपाट करने वाले बदमासो को मौत की नींद सुला दी थी। राजपूतों द्वारा बनाये गए क़िलों को हटा दिया गया और जंगलों की साफ़ सफाई करवा कर वहाँ अफ़ग़ान सैनिकों के रहने का बंदोबस्त कर दिया गया ताकि वे सड़कों की सुरक्षा कर सकें।

एक खतरनाक नेता

बलबन जब भी अपने दरबार से बहार निकलते थे तब उनके चारो ओर अंगरक्षक नंगी तलवारें के लिए उनके पीछे पीछे चले गए थे। अपने दरबार में होने वाले हँसी-मज़ाक को उन्होंने बंद करवा दिया।

ये बात साबित करने के लिए की उसके सरदार कभी भी उनकी टक्कर के नहीं हो सकते हैं, उन्होंने उनके साथ बैठ कर शराब पीना भी कर दिया। उनके अपनेए गए बहुत से रिवाज ऐसे थे जो की “इरानी रिवाज” कहलाते थे और उन रिवाज को ग़ैर-इस्लामी समझा जाता था।

लेकिन इस बात का विरोध करने की हिम्मत किसी में नहीं थी। क्योंकि जब मध्य और पश्चिमी एशिया में मंगोलों के हमले से ज्यादातर इस्लामी साम्राज्य समाप्त हो चुके थे, बलबन और दिल्ली सल्तनत को ही उस समय इस्लाम के नेता के रूप में देखा जाता था।

बलबन की मृत्यु

1286 में अपने प्रिय पुत्र जिसका नाम मुहम्मद था उसकी मृत्यु का सदमा को धीर न कर पाने के कारण से 80 वर्ष की आयु में बलबन की मृत्यु हो गई।

अपनी मौत से पहले बलबन ने अपने दूसरे बेटे को जिसका नाम “बुगरा ख़ाँ” था उसे उत्तराधिकारी बनाने के लिए बंगाल से बुलवाया था।

लेकिन उनका बेटा बंगाल के ऐसो-आराम को छोड़ कर नहीं आना चाहता था इसलिए बलबन ने अपने पोते को अपना उत्तराधिकारी चुना।

निष्कर्ष: Ghiasuddin Balban Biography

जी हाँ दोस्तों आपको आज की पोस्ट कैसी लगी, आज हमने आपको बताया कि Ghiyas-ud-din Balban History and Facts और बलबन का इतिहास बहुत ही आसान शब्दों में हमने भी आज की पोस्ट में सीखा।

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Biography of Ghiyas-ud-din Balban आज मैंने इस पोस्ट में सीखा। आपको इस पोस्ट की जानकारी अपने दोस्तों को भी देनी चाहिए। तथा Social Media पर भी यह पोस्ट ज़रुर Share करे। इसके अलावा, कई लोग इस जानकारी तक पहुंच सकते हैं।

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